ब्रह्मांड में आज जितना भी प्रकाश है, वह कहां से आया? वैज्ञानिकों ने शायद इस सवाल का जवाब खोज लिया है. वह जवाब छिपा था 13.4 अरब साल से भी पुरानी आकाशगंगा में.
ब्रह्मांड के अंधेरे रहस्यों से पर्दा उठाने वाली एक गैलेक्सी ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया है. यह गैलेक्सी, जिसे JADES-GS-z13-1 नाम दिया गया है, बिग बैंग के सिर्फ 33 करोड़ साल बाद अस्तित्व में आई थी. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस गैलेक्सी ने ब्रह्मांड के अंधकार युग (Cosmic Dark Age) को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी. JADES-GS-z13-1 की स्टडी से यह संकेत मिला है कि इसने ब्रह्मांड की उस शुरुआती अवस्था में रोशनी फैलाई थी, जब चारों तरफ घना हाइड्रोजन का कोहरा छाया हुआ था. यह खोज इस बात को समझने में मदद कर सकती है कि Epoch of Reionization (ब्रह्मांड के दोबारा आयनीकरण की अवस्था) कैसे शुरू हुई और इस प्रक्रिया में कौन-कौन सी गैलेक्सियां शामिल थीं.
कैसे खत्म हुआ ब्रह्मांड का अंधेरा?
बिग बैंग के तुरंत बाद ब्रह्मांड में बेहद गर्म और घना प्लाज्मा था, जिसमें न्यूक्लियस और इलेक्ट्रॉन्स तैर रहे थे. इस समय कोई भी रोशनी इस घने वातावरण से बाहर नहीं निकल सकती थी, जिससे पूरा ब्रह्मांड अंधकारमय था. करीब 3 लाख साल बाद, जब ब्रह्मांड थोड़ा ठंडा हुआ, तो न्यूक्लियस और इलेक्ट्रॉन्स मिलकर न्यूट्रल हाइड्रोजन गैस बनाने लगे. इस दौरान, कुछ प्रकाश बाहर निकलने लगा, लेकिन ब्रह्मांड अब भी ज्यादातर अंधकार में ही था.
फिर, पहली गैलेक्सियां और सितारे बनने लगे. इन्हीं शुरुआती तारों और गैलेक्सियों से निकलने वाली ऊर्जा ने हाइड्रोजन परमाणुओं को दोबारा आयनित करना शुरू किया, यानी उनकी इलेक्ट्रॉन्स को अलग कर दिया. जैसे-जैसे यह प्रक्रिया बढ़ी, ब्रह्मांड का कोहरा धीरे-धीरे हटने लगा और रोशनी फैलने लगी.
करीब 1 अरब साल बाद, यह प्रक्रिया पूरी हो गई और ब्रह्मांड पूरी तरह से पारदर्शी हो गया. आज जो सितारे और आकाशगंगाएं हम देख पाते हैं, वे इसी प्रक्रिया के कारण संभव हुए.
JADES-GS-z13-1 ने किया सबको हैरान!
इस गैलेक्सी से आने वाली रोशनी में Lyman-alpha इमिशन नाम की एक खास स्पेक्ट्रल सिग्नेचर मिली है. यह तब बनती है जब हाइड्रोजन परमाणु ऊर्जा को अवशोषित कर किसी ऊर्जावान अवस्था में पहुंचते हैं और फिर वापस गिरते हैं.
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रॉबर्टो मइओलिनो ने कहा, “हमें इस गैलेक्सी से एक बेहद स्पष्ट Lyman-alpha सिग्नल मिला, जो यह दिखाता है कि इस समय तक इसका आसपास का वातावरण पूरी तरह से साफ हो चुका था. यह हमारी पूर्व की धारणाओं से बिल्कुल अलग है और इसे देखकर वैज्ञानिक हैरान हैं.”
वैज्ञानिकों के लिए असली सवाल यह है कि ब्रह्मांड के इस शुरुआती दौर में यह रोशनी इतनी साफ-साफ कैसे दिख रही है?
क्या ब्लैक होल था इसकी रोशनी के पीछे?
वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा सवाल है, अगर JADES-GS-z13-1 ने ही आयनीकरण प्रक्रिया को तेज किया, तो आखिर यह इतना तेज और चमकीला कैसे था? एक थ्योरी यह कहती है कि इस गैलेक्सी के केंद्र में एक सुपरमैसिव ब्लैक होल हो सकता है, जो चारों तरफ से गैस और धूल को खींचते हुए तेज़ी से प्रकाश उत्पन्न कर रहा होगा.
यूएस के एरिज़ोना विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री केविन हाइनलाइन ने कहा, “हमें नहीं लगता था कि ब्रह्मांड के इतने शुरुआती दौर में कोई गैलेक्सी इस तरह की रोशनी उत्पन्न कर सकती है. यह खोज बताती है कि शायद हमने ब्रह्मांड के विकास को अभी तक पूरी तरह से समझा ही नहीं है.
एक अन्य संभावना यह भी हो सकती है कि इस गैलेक्सी में अत्यधिक गर्म और विशालकाय सितारे मौजूद थे, जो सूर्य से 100 से 300 गुना बड़े थे. ये सितारे बेहद ज्यादा ऊर्जा छोड़ते हैं और इनके कारण आसपास की हाइड्रोजन जल्दी से आयनित हो सकती थी.
अगर यह सच साबित होता है, तो इसका मतलब होगा कि शुरुआती ब्रह्मांड में हमारी सोच से कहीं ज्यादा विशाल और गर्म सितारे मौजूद थे.
फिर धरी की धरी रह जाएगी ब्रह्मांड की हमारी समझ!
वैज्ञानिक इस गैलेक्सी को और गहराई से समझने के लिए आगे और भी स्टडी करने वाले हैं. James Webb Space Telescope (JWST) से मिली यह जानकारी आने वाले वर्षों में ब्रह्मांड की पहली रोशनी और उसके बनने की प्रक्रिया को समझने में मदद कर सकती है.
यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के खगोलशास्त्री पीटर जैकोबसेन कहते हैं, “हमें उम्मीद थी कि James Webb Space Telescope हमें पहले से ज्यादा पुरानी गैलेक्सियां दिखाएगा, लेकिन हमें नहीं पता था कि यह हमें इतने बड़े सरप्राइज़ भी देगा!”
इस खोज ने एक बार फिर साबित किया है कि ब्रह्मांड के बारे में जितना हम जानते हैं, उससे कहीं ज्यादा हमें अब भी समझना बाकी है.